Panchatantra ki Kahani : एक बार की बात है, एक साधु अपने बगीचे में मंदिर बनवाना चाहता था। मंदिर का ज़्यादातर काम लकड़ी से होना था, इसलिए उस साधु ने मंदिर बनाने के लिए कई बढ़ई, मिस्त्रियों और मज़दूरों को काम में लगाया।

इसके बाद मंदिर का काम ज़ोर-शोर से चल रहा था। नियमित रूप से सभी काम पर आते थे। सभी काम करने वालों का नियम था कि वे सुबह से काम शुरू कर देते थे, और मध्याह्न भोजन के लिए दोफ़र में 1 घंटे का ब्रेक लेते थे।

उस समय वो अपने अपने घर जाकर खाना खाते और आराम करते थे उसके बाद सभी कुछ देर में वापस आकर फिर काम शुरू कर देते थे, जो की शाम तक चलता था।

panchatantra ki kahani - shaitaan bandar
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Panchatantra Stories in Hindi में आगे की घटना एक सीख देने वाली है :

एक दिन सभी लोग मध्याह्न भोजन के लिए घर जाने की प्लानिंग कर चुके थे, इस बीच 2 मिस्त्री लकड़ी का एक बड़ा सा टुकड़ा चीर रहे थे, लेकिन उनका काम पूरा नही हुआ।

जब लोगों के कहने पर वो अपना काम बंद करके घर जाने की तैयारी करें लगे। इसके लिए उन्होंने लकड़ी को जितना चीरा था, उसके बीच में बड़ा सा लड़की का टुकड़ा फँसा दिए और काम बंद करके घर चले गए।

पंचतंत्र की कहानी (Panchatantra ki Kahani) में आगे पता चलता है कि इसी बीच एक घटना घटी, दोपहर में जब सभी लोग मध्याह्न भोजन के लिए अपने घर गए हुए थे, तो बंदरों का एक समूह जहाँ मंदिर बन रहा था, उस स्थान पर आया।

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सभी बंदर मंदिर निर्माण स्थल पर इधर उधर उछल-कूद कर रहे थे, और मशीनों के साथ खेलने लगे। सभी मंदिर सब मशीनों को छू कर देखते, और लकड़ी के बंडलों में उछल रहे थे।

इसी बीच एक शैतान बंदर एक देखता है की 1 लकड़ी आधी कटी हुई है और उसके बीच में 1 और लकड़ी को फँसाया गया है। वह इसे देख कर उत्सुक हो गया और जाकर उस लकड़ी के साथ खेलने लगा।

वह जिस लकड़ी को फँसाया गया था, उसके साथ जाकर खेलना लगा। उसे खींचता, इधर उधर कर रहा था। इस बीच उसकी पूछ चीरी हुई लकड़ी के बीच में चली गई, जिसका उसे ध्यान नही था। ना ही उसे कोई डर था।

कुछ देर फँसी लकड़ी के साथ छेड़-छाड करने से बंदर लकड़ी के टुकड़े को निकालने में कामयाब हो गया। जैसे ही लकड़ी का हिस्सा निकला तो बंदर ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा, बचाओ! बचाओ! बचाओ! और रोने लगा।

पंचतंत्र की कहानी (Panchatantra ki Kahani) में आपने जाना की बंदर जोर ज़ोर बचाओ! बचाओ चिल्ला रहा है, लेकिन ऐसा क्यों? क्या आपको पता है बंदर क्यों चिल्ला रहा है। आपने ध्यान नही दिया, कोई बात नही। आइए जानते हैं क्यों? इसके लिए panchatantra stories in hindi को आगे पढ़ें।

जब बंदर लकड़ी का टुकड़ा निकाल रहा था, तो उसकी पूँछ चीरी वाली लकड़ी के बीच के हिस्से में चली गई थी, इसी बीच लकड़ी का टुकड़ा निकल गया इससे चीरी लकड़ी के दोनों हिस्से आपस में निपक गए।

इस वजह से बंदर की पूँछ उस लकड़ी के बीच में फँस गई जिससे उस बंदर को बहुत दर्द हो रहा था और वह कोशिश करने के बाद भी अपनी पूँछ उस लकड़ी से निकालने में असफल हो रहा था।

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एक तो लकड़ी के बीच में फँसी होने की वजह से उसे दर्द हो रहा था, दूसरा जब वह निकालने के लिए खींचता था तो उसे और ज़्यादा दर्द होता था। इसी लिए वह ज़ोर ज़ोर से चिल्ला कर रोने लगा।

जैसा कि वह शैतान बंदर था, इसलिए उसकी क़िस्मत में ऐसी दुर्घटना लिखी थी। अगर वह दूसरों के काम में हस्तक्षेप ना करता और दूसरे बंदरों की तरह इस तरह की कोई हरकत ना करता तो आज उसे यह सब सहन नही करना पड़ता।

उस लकड़ी में फँस जाने के बाद और उसके रोने और चिल्लाने की वजह से दूसरे बंदर भी उसके पास आ गए और उसे बचाने में मदद करने लगे लेकिन उनकी कोशिश बेकार हो गई।

इस बीच मज़दूर और मिस्त्री काम पर वापस आ गए। और उनको आता देख सभी बंदर उसे अकेले छोड़ कर भाग गए। मिस्त्रियों और मज़दूरों ने देखा कि बंदर की पूँछ लकड़ी में फँसी है, तो उन्होंने कोशिश करके उस बंदर को बचाया।

लेकिन अपनी शैतानी और दूसरों के काम में हस्तक्षेप करने की वजह से उस बंदर की पूँछ में बहुत ज़्यादा चोट लग गई थी और वह बुरी तरह घायल हो गया था।

मज़दूरों ने जैसे ही उस बंदर की पूँछ लकड़ी से निकाली तो वह तुरंत वहाँ से रफ़ू-चक्कर हो गया और फिर दोबारा वह कभी वहाँ नही आया।

पंचतंत्र की कहानी (Panchatantra ki Kahani) से हमें सीख मिलती है की कभी भी हम सब को ऐसे कामों में हस्तक्षेप नही करना चाहिए, जिसे बारे में हमें कोई ज्ञान ना हो कि इससे क्या हो सकता है।

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बुद्धिमान लोगों से आप लोगों ने सुना भी होगा कि – जो लोग दूसरों के कामों में हस्तक्षेप करते हैं, वास्तव में उनको कभी ना कभी गहरी चोट लगती है और दुःख होता है।

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