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पंचतंत्र का परिचय, रचना, इतिहास : Panchtantra Introduction in Hindi

पंचतंत्र (Panchtantra) : भारतीय साहित्य की नीतिकथाओं का विश्व में महत्त्वपूर्ण स्थान है। ऐसा ही एक विश्वविख्यात कथा ग्रन्थ पंचतंत्र है। इसके रचयिता आचार्य विष्णु शर्मा है। यह पुस्तक संस्कृत भाषा में लिखी गई थी इसलिए संस्कृत नीतिकथाओं में पंचतन्त्र का पहला स्थान माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि एक राजा के तीन बिगडे बेटों को सही राह दिखाने के लिए पंडित विष्णु शर्मा ने ईसा से लगभग 200 से 300 वर्ष पूर्व पंचतंत्र में दी गई कहानियों को लिखा था।

मूल रूप में संस्कृत में रचित इस नीतिकथा पुस्तक का महत्व इसी बात से पता चलता है कि इसका अनुवाद विश्व की लगभग हर भाषा में हो चुका है। हालाँकि इसका हिंदी भाषा में प्रकाशन कई विदेशी भाषाओं में प्रकाशन के बाद शुरू हुआ था। अब विलुप्त हो चुकी पंचतंत्र की मूल संस्कृत कृति संभवत: 100 ई.पू. से 500 ई. के बीच किसी समय लिखी गई थी।

पंचतंत्र के लेखक कौन हैं (Panchtantra Ke Lekhak Kaun Hain)

पंचतंत्र एक सुप्रसिद्ध और विश्वविख्यात नीतिकथाओं का ग्रंथ हैं। इसके लेखक (रचयिता) का नाम – पंडित विष्णु शर्मा है। आचार्य विष्णु शर्मा एक प्रसिद्द संस्कृत भाषा के लेखक थे, उन्होंने इस पुस्तक को संस्कृत भाषा में लिखा था।

पंचतंत्र के पात्र किस तरह के है?

पंचतंत्र के पात्र जंगल के पशु और पक्षी हैं। आचार्य विष्णु शर्मा जी ने इस पुस्तक में वर्णित सभी नीतिकथाओं में पशु-पक्षियों को मुख्य पात्र बना कर बड़े ही रोचक तरीके से कहानियाँ गढ़ी थी।

पंचतंत्र नाम कैसे पड़ा?

पांच भाग (तंत्र) में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया है। इस किताब में जानवरों को पात्र बनाकर शिक्षाप्रद बातें लिखी गई हैं। इसमें मुख्यत: पिंगलक नामक सिंह के सियार मंत्री के दो बेटों दमनक और करटक के बीच के संवादों और कथाओं के जरिए व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी गई है। सभी कहानियां प्राय: करटक और दमनक के मुंह से सुनाई गई हैं।

पंचतंत्र के पांच भाग (तंत्र) कौन से हैं?

पंचतंत्र के पांच भाग (तंत्र) निम्नलिखित हैं :-

  1. मित्रभेद :– (मित्रों में मनमुटाव और अलगाव पर लिखी गई नीतिकथाएँ)
  2. मित्रलाभ या मित्रसंप्राप्ति :– (मित्र प्राप्ति एवं उसके लाभ के विषय पर लिखी गई कहानियाँ)
  3. काकोलुकियम :- (कौआ और उल्लू की कथा)
  4. लब्धप्रणश :- (मृत्यु या विनाश के आने पर, यदि जान पर आ बने तो क्या)
  5. अपरीक्षित कारक :- (जिसको परखा नहीं गया हो उसे करने से पहले सावधान रहे एवं हड़बड़ी में कोई कदम ना उठाये विषय पर लिखी गई कथाएँ)

पंचतंत्र के संस्करण

पंचतंत्र के कुल 4 संस्करण मौजूद हैं। जिनकी जानकारी निम्नलिखित है :

  • प्रथम संस्करण :- यह मूल ग्रंथ का पहला अनुवाद माना जाता है, जो अब अरबी और सीरियन भाषा में मिलता है।
  • द्वितीय संस्करण :- पंचतन्त्र गुणाढ्यकृत ‘बृहत्कथा’ को दूसरा संस्करण माना जाता है। बृहत्कथा पुस्तक का अनुवाद पैशाची भाषा में किया गया था हालाँकि इसका मूल रूप नष्ट (या ग़ायब) हो चुका है। अब सोमदेव लिखित ‘कथासरित्सागर’ और क्षेमेन्द्रकृत ‘बृहत्कथा मंजरी’ द्वितीय संस्करण के ही अनुवाद माने जाते हैं।
  • तृतीय संस्करण :- यह संस्करण बहुत ही प्राचीन माना जाता हैं, इसमें तन्त्राख्यायिका एवं उससे सम्बद्ध जैन कथाओं का संग्रह देखने को मिलता है। इसे ही Panchtantra का मूल रूप माना जाता है और यही संस्करण आज के समय का प्रचलित ‘पंचतन्त्र’ है। इसका मूल स्थान कश्मीर है। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् डॉ॰ हर्टेल ने इसके प्रामाणिक संस्करण को खोजने के लिए कठिन परिश्रम किया था, तब जाकर आज यह दुनिया के सामने आ पाया। डॉ॰ हर्टेल के अनुसार तन्त्राख्या या तन्त्राख्यायिका ग्रंथ ही पंचतन्त्र का मूलरूप है।
  • चतुर्थ संस्करण :- इस संस्करण का प्रतिनिधित्व नेपाली ‘पंचतन्त्र’ और ‘हितोपदेश’ करते हैं और यह दक्षिणी पंचतंत्र का मूलरूप माना जाता है।

पंचतंत्र के संस्करणों से पता चलता है कि ‘पंचतन्त्र’ एक ग्रन्थ न होकर एक विशाल साहित्य का प्रतिनिधित्व कर रहा है।

संस्कृत में रचित पंचतंत्र

सैद्धांतिक रूप में पंचतंत्र को नीति की पाठ्य पुस्तक के रूप में रचा गया है इसकी सूक्तियाँ परोपकार की जगह घाघपन और चतुराई को महिमा मंडित करती जान पड़ती है। इसका मूल ग्रंथ संस्कृत छंद और गद्य पदों का मिश्रण है, जिसके पांच भागों में से एक में कथाएँ है। इसकी भूमिका में समूची पुस्तक के सार को समेंटा गया है। इसके लेखक ने उपदेशप्रद पशुकथाओं के माध्यम से एक राजा के तीन मंदबुद्धि बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी।

Panchtantra में किस तरह की कथाएँ दी गयी हैं?

मूल रूप से पंचतंत्र को संस्कृत भाषा में लिखा गया था। इस नीतिकथा ग्रंथ में लेखक ने जंगल के पशु,पक्षी और जानवरों को कहानियों के पात्र के रूप में जगह दी थी। इसकी कहानियाँ इतनी सरल भाषा में समझाई गई हैं, कि आज भी जीवंत लगती हैं। इसमें कुल 5 भाग (तंत्र) हैं। इसी वजह से इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र पड़ा। यहाँ पर मित्रभेद, मित्रलाभ, कौआ और उल्लू की कहानियाँ जैसे कई विषयों पर नीतिकथाएँ लिखी गई हैं। जो लोगों आज भी बहुत रोचक लगती हैं।

प्रभावपूर्ण कथाएँ

पाँच तंत्रों में पाँच प्रमुख कथाएँ लिखी गई हैं। इनके संदर्भ में भी अनेक उपकथाएँ प्रत्येक तंत्र में यथासार आती जाती हैं। इस तरह पुस्तक का प्रत्येक तंत्र कथाओं की लड़ी-सा लगता है। पंचतंत्र में कुल 87 कथाएँ हैं, जिनमें अधिकांश प्राणी कथाएँ हैं। प्राणी कथाओं का उल्लेख सर्वप्रथम महाभारत में मिलता है। विष्णु शर्मा ने अपने पंचतंत्र की रचना शायद महाभारत से ही प्रेरणा लेकर की थी। उन्होंने इसमें महाभारत के कई संदर्भ भी लिये हैं। इसी प्रकार से रामायण, महाभारत, मनुस्मृति तथा चाणक्य के अर्थशास्त्र से भी उन्होंने अनेक विचार और श्लोकों को लिया है। इसी वजह से माना जाता है कि विष्णु शर्मा चंद्रगुप्त मौर्य के पश्चात् ईसा पूर्व पहली शताब्दी में जन्म लिए रहे होंगे।

पंचतंत्र की कथाओं की शैली सर्वथा स्वतंत्र है। इसका गद्य जितना स्पष्ट और सरल है, उतने ही इसके श्लोक भी समयोचित, अर्थपूर्ण, पठन सुलभ और मार्मिक हैं। परिणामस्वरूप इस ग्रन्थ की सभी कथाएँ प्रभावपूर्ण, आकर्षक और सरस बनी हुई हैं। इसके लेखक श्री विष्णु शर्मा ने अनेक कथाओं की समाप्ति श्लोक से की है और उसी से आगामी कथा का सूत्रपात भी किया है।

पंचतंत्र के रचयिता कौन है

विश्व प्रसिद्ध संस्कृत नीतिकथा पुस्तक पंचतन्त्र के रचयिता पं॰ विष्णु शर्मा थे। वे दक्षिण भारत के महिलारोप्य नामक नगर में रहते थे। लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व उनके द्वारा पंचतन्त्र में लिखी गई नीतिकथाओं का आज भी हिंदी साहित्य में पहला स्थान माना जाता है। अभी तक के उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर ऐसा माना जाता है कि जब इस ग्रंथ की रचना पूरी हुई होगी, तब विष्णु शर्मा की उम्र 80 वर्ष के करीब थी।

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